बारिश का पहला प्यार – भाग 2: मुलाक़ातें और मुस्कानें
उस दिन की मुलाक़ात के बाद जय की ज़िन्दगी जैसे बदल गई थी। वो बस स्टॉप अब सिर्फ सफ़र की जगह नहीं रहा, वो एक उम्मीद बन गया था—उम्मीद उस मुस्कुराहट की, जो बारिश में भीग रही थी।
अगले दिन जय फिर उसी वक़्त, उसी बस स्टॉप पर पहुंचा। बारिश नहीं हो रही थी, लेकिन दिल में कुछ तो बरस रहा था। और फिर... वो आई।
हलके पीले रंग की कुर्ती, किताबों से भरा बैग, और वही खिलखिलाती मुस्कान।
जय ने हिम्मत जुटाकर फिर से बात की,
"कल बारिश में भीगना अच्छा लगा?"
लड़की हँसते हुए बोली,
"बहुत... लेकिन उससे भी ज़्यादा अच्छा लगा तुमसे बात करना।"
जय थोड़ा शर्मा गया, फिर धीरे से पूछा,
"नाम तो बता दो?"
"अवनी," उसने कहा, जैसे कोई गीत हो।
फिर हर दिन उनकी मुलाकातें होने लगीं—कभी बस स्टॉप पर, कभी कैंटीन में चाय के कप के साथ, और कभी बिना बोले, सिर्फ़ एक दूसरे की आंखों में देखते हुए।
जय और अवनी अब हर छोटी चीज़ में खुशी ढूंढने लगे थे। वो बारिश अब बस मौसम नहीं था, वो उनकी पहचान बन गई थी।
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